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Monday, August 16, 2010

छात्रों की बात फिर कभी........


यह महज संयोग नही होगा कि माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवम संचार विश्वविद्यालय के स्वंत्रतता दिवस समारोह मे बोलते हुए कुलपति के भाषण से छात्र सिरे से गायब रहे. वे भर भाषण नही मालूम विश्वविद्यालय के किस अबुझ प्रगति की चर्चा करते रहे, जिसमे सम्विदा पर काम कर रहे अध्यापको की नियुक्ति और सामूहिकता सब मौजूद थे, पर बतौर छात्र हम कहीं नही थे.

मानो, विश्व्विद्यालय छात्रों को पढाने के वास्ते या समाज को पत्रकारों की नई पौध देने के वास्ते नही, बल्कि, कुछ लोगो की नौकरी का जुगाड हो जाये, इसके लिये स्थापित किया गया हो.

भाषण खत्म होने पर जब मैने उनसे यह बात कही तो गोलमोल जवाब दे गये. क्या कहा, उनके ही शब्दो मे, “ चूंकि आज छात्र मौजूद नही थे सो उनकी बात नही हो सकी, सत्रारम्भ मे छात्रों की बात की जायेगी.”

अब सवाल यह है कि क्या ऐसा भी कोई शैक्षणिक संस्थान हो सकता है, जहा बिना छात्रो के भी स्वतंत्रता दिवस जैसे महत्वपूर्ण समारोह आयोजित किये जाते हो. हमारे माननीय कुलपति और विश्वविद्यालय के तमाम कर्ता-धर्ताओं को एक कमेटी बनाकर जांच करवानी चाहिये कि भारत के इतिहास मे अब तक, कितने स्कूल कालेज ऐसे है जहा बिना छात्रो के स्वतंत्रता दिवस समारोह मनाया गया हो. और फिर किन परिस्थितिओ मे!

यह विश्व्विद्यालय का दुर्भाग्य ही कहा जायेगा कि सेमेस्टर सिस्टम होने के बावजूद भी दो महीने से भी लम्बी गर्मी की छुट्टी रखी गयी. और, स्वंतत्रता दिवस के ठीक एक दिन बाद (ठीक एक दिन बाद) से नये सत्र के शुरुआत की घोषणा की गयी. जोकि यह साबित करने के लिये काफी है कि इन तमाम खाये-अघाये लोगो के लिये यह दिन महज खानापुर्ति का दिन है, और कुछ नही. भले ही ये लोग, देश की स्वतंत्रता को लेकर, मंच से लम्बी-लम्बी बाते उछालें.

यह दु:खद है कि जो दिन हजारो-लाखो के शहादत को याद करने का दिन होता है, आजादी से अब तक तय की दूरी के समीक्ष का दिन होता है और साथ ही आगे आने वाले दिनो के वास्ते स्वप्न देखने का दिन होता है, वो हमारे विश्वविद्द्यालय के लिये छुट्टी का दिन होता है. वाह रे हमारे कर्ता-धर्ता, वाह!

ऐसे मे क्या इनसे यह उम्मीद की जा सकती है कि इनके पास वो शौक, वो विजन (और फुरसत भी) है कि एक सडते- गलते समाज को उसके जरुरत के मुताबिक पत्रकार दे सके. सोचने की जरुरत है!